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2026-04-03
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30 minutes ago
गोपाल ने शांत भाव से कहा, ‘महाराज, जब मैं सुबह आपके पास आया, तब अशांत था। मेरा चित्त खिन्न था। रात को सही ढंग से सो नहीं पाया था, इसलिए तंद्रिल और बोझिल-सा था। ऐसे में आपने मुझे सरोवर की ओर भेजा। मैं सरोवर के पास उसी बरगद के नीचे थोड़ी देर बैठकर विश्राम करने लगा, ताकि चैतन्य हो लूं। मैंने देखा, सरोवर की राह में एक बड़ा-सा पत्थर पड़ा हुआ है। कई लोगों को उस पत्थर से चोट लग चुकी थी। मैं पत्थर के क़रीब गया कि उसे वहां से हटा दूं किंतु मैं वैसा नहीं कर पाया, क्योंकि पत्थर का कुछ भाग मिट्टी में गड़ा हुआ था। मैं थककर पुन: बरगद के नीचे आकर बैठ गया। कई लोग पुन: इस पत्थर की ठोकर से आहत हुए लेकिन सब अपनी चोट सहलाते आगे बढ़ गए। किसी को भी यह चिंता नहीं हुई कि उस पत्थर को वहां से हटाने का उद्योग करे। लेकिन एक आदमी उधर से गुज़रते समय पत्थर के पास रुका और उसे हटाने लगा। काफ़ी परिश्रम के बाद उसने पत्थर को वहां से उखाड़कर सड़क से दूर ले जाकर रखा और थककर सरोवर के किनारे विश्राम करने लगा। उसे न तो किसी से प्रशंसा की अपेक्षा थी और न किसी से अपने श्रम का मूल्य पाने की लालसा। उसके चेहरे पर कर्तव्य-पालन की तृप्ति की आभा थी। महाराज, मैंने इसी व्यक्ति के बारे में कहा था कि सरोवर के पास केवल एक आदमी है। आदमी वही होता है, जो अपने अलावा औरों के बारे में भी सोचे। सरोवर में स्नान करने गए शेष तमाम लोगों को अपने सिवा और किसी की परवाह नहीं थी।’
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1 hour ago
महाराज कृष्णचंद्र ने दोनों थैलियां गोपाल के हवाले कर दीं। सोने की अशर्फियां पाकर गोपाल की तो मौज हो गई। दो महीने उसने खूब मौज–मस्ती मारी। नवाब के धन से खूब गुलछर्रे उड़ाए।
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5 hours ago
दूसरे दिन , सुबह- सुबह पंडिताइन घबराई- सी गोनू झा को झंकोरकर जगाने